अनुच्छेद 35A और जम्मू कश्मीर कैसे प्रभावित् करता है देश के अन्य राज्यों के प्रवाशिओ पर

अनुच्छेद 35A और जम्मू कश्मीर कैसे प्रभावित् करता है देश के अन्य राज्यों के प्रवाशिओ पर

अनुच्छेद 35A और जम्मू कश्मीर कैसे प्रभावित् करता है देश के अन्य राज्यों के प्रवाशिओ पर

जम्मू-कश्मीर सरकार और वहां की विधानसभा राज्य के स्थायी निवासी की परिभाषा तय कर सके , अचल सम्पति खरीदने से रोका जा सके , इस लिए यह धरा लगायी गयी थी , जिसने भारत के संविधान को टाक पर रख दिया और नए अलगाव दिखाए |

भेदभाव पूर्ण बताते हुए एक NGO ने अपील की है ,इसे संसोधन किया जाय या हटाकर भारतीय संविधान लागू कर दिया जाय

अनुच्छेद 35A और जम्मू कश्मीर कैसे प्रभावित् करता है देश के अन्य राज्यों के प्रवाशिओ पर

कश्मीरी भारत के अन्य भागो में जॉब करसकते है और बिज़नेस कर सकते है , लेकिन भारत के अन्य राज्यों के निवासी वहा जाकर ना तो जॉब कर सकते है और ना ही वहा के गोवत जॉब में अप्लाई कर सकते है , और ये तो सर्वविदित हो चला है बिज़नेस और अचल सम्पति खरीदी नहीं जा सकती किसी भी भारतीय द्वारा जो जम्मू कश्मीर का निवासी नहीं है

जम्मू कश्मीर की हाई कोर्टमें सन 2002 में सुनवाई हुई थी , अपने फैसले में अनुच्छेद 35ए के मुद्दे का पहली बार में ही निपटारा कर दिया गया था ।

हाई कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 35ए तथा जम्मू-कश्मीर सँविधान की धारा 6(स्टेट के रजिस्टर्ड निवशिओ से संबंधित मामलो ) को चुनौती देने वाली चारू वली खन्ना की पेटिशन पर सुनवाई हुई थी ।

पेटिशन में संविधान के उनबातो को चुनौती दी , जो राज्य के बहिर्वाषित व्यक्ति को जीवन साथी चॉइस करने वाली महिला को अचल संपत्ति के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। यह कानून उसकी संतान पर भी लागू होता है

वकील बिमल रॉय जाड ने चारू की प्वेटिशन फाइल की थी उन्हों ने कहा है कि अगर कोई महिला जम्मू-कश्मीर के बाहर के व्यक्ति से शादी करती है तो वह अचल संपत्ति के अधिकार के साथ ही राज्य में रोजगार के संभावित अवसरों से भी वंचित हो जाती है।

जम्मू-कश्मीर के अस्थायी निवासी प्रमाणपत्र धारक लोकसभा चुनाव में तो मतदान कर सकते हैं परंतु वे राज्य के स्थानीय चुनावों में मतदान नहीं कर सकते।ऐसा क्यों इसे बदला जाना चाहिए

दिल्ली स्थित एक गैर सरकारी संगठन ‘‘वी द सिटीजन्स’’ ने भी संविधान के अनुच्छेद 35ए के अगेंस्ट पेटिशन फाइल कर राखी है जिसे प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने वृहद पीठ के पास भेज दिया था।

जस्टिस दीपक मिश्रा और ए ऍम खानविलकर की पीठ ने इसे एक अन्य ऐसे ही फाइल के साथै इसे पिन कर लिया है इसकी सुनवाई महीने के अंत में तीन जस्टिसस की पीठ सुनवाई करेगी जरुरत हुई तो पांच जस्टिस की पीठ भी बिठाई जा सकती है

 

अनुच्छेद 35A और जम्मू कश्मीर कैसे प्रभावित् करता है देश के अन्य राज्यों के प्रवाशिओ पर

आर्टिकल 35A के विरोध में दलील जो अबतक दी गयी

– यहां बसे कुछ हिंदू परिवार के लोगों को कोई अधिकार नहीं
– 1947 में जम्मू में बसे हिंदू परिवार अब तक शरणार्थी
– हिंदू परिवार अब तक शरणार्थी ये शरणार्थी सरकारी वहा नौकरी हासिल नहीं कर सकते
– इन हिंदू परिवार अब तक शरणार्थी सरकारी शिक्षण संस्थान में दाख़िला नहीं
– इनको हिंदू परिवार अब तक शरणार्थी निकाय, पंचायत चुनाव में वोटिंग राइट नहीं
– संसद के द्वारा नहीं, राष्ट्रपति के आदेश से जोड़ा गया आर्टिकल ३५ा, मतलब संसद में इसका कुछ नहीं होसकता

 

धारा ३७० के अंतर्गत जम्मू एंड कश्मीर को विशेष अधिकार

धारा३७० के अंतर्गत जम्मू एंड कश्मीर को विशेष अधिकार दिए गए है, इसके चलते भारतीय संविधान के इतर ये एक विवादित मुद्दा रहा है , बीजेपी और कई राष्ट्रवादी राजनैतिक पार्टी इसको वहा फैले हुए अलगाव के लिए कारण मानती है , और

समय समय पर NGO और ऐसी राजनैतिक पार्टिओ द्वारा इसको हटाने यानी समाप्ति करने की डिमांड रही है ,

इसको भारतीय संविधान में टेम्पररी बेससीस पर , संक्रमणकालीन और
स्पेशल subbindके तहत सम्बन्धी पार्ट २१ का धारा३७०   जवाहरलाल नेहरू ने अपने राजनैतिक फायदों के लिए डिज़ाइन कराया था जिसकी वजह से आजतक वबाल मचा हुआ है

 

भारतीय संसद को जम्मू-कश्मीर राज्य के बारे में रक्षा संबधी आदेश और आर्डर करने के अधिकार , विदेश मामले में निर्णय लेने के अधिकार और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार(eg भारतीय सरकार चाहे तो कुछ समय के लिए वहा के कम्युनिकेशन को इमरजेंसी के लिए रोक सकती है ) है लेकिन इसके आलावा कुछ और करना है तो phle वहा की राज्य सरकार यानी जम्मू कश्मीर की राज्य सरकार से मिलकर मशवरा लेकर कार्य करना होगा , कुछ कुछ दिल्ली के केजरीवाल जी की तरह

यहाँ पर धारा संविधान की धारा 356 लागू नहीं की जासकती इसके तहत केंद्र सरकार किसी भी राज्य की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शाशन लगा सकती है पर जम्मू एंड कश्मीर में नहीं

भारत के संविधान द्वारा बनाया गया 1976 का शहरी भूमि क़ानून यहाँ लागू नहीं होता, इसके तहत भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर और विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते

भारतीय संविधान की धारा 360 के अन्तर्गत देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है जो यहाँ अप्लाई नहीं किया जा सकता वजह धारा 370

जम्मू एंड कश्मीर का भारत में उस समय विलय होना ज्यादा जरुरी था तो इस धारा को बना कर विलय कर लिया गया जिसके तहत

विशेष अधिकार वहा के नागरिको को दिए गए

जम्मू-कश्मीर के निवासी के पास दोहरी यानी भारतीय और जम्मू एंड कश्मीर दोनों की नागरिकता होती है।

आपको जानकार आश्चर्य होगा की जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रध्वज भी अलग है।ये भी इस अमंद मेन्ट में है

यहाँ की विधानसभा की कार्यकारिणी भी भारतीय विधानसभा से अलग होती है , जम्मू – कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है गौरतलब है की अन्य स्टेट्स की विधानसभाओं का अवधि 5 वर्ष का होता है।

इसको कोई भी भारतीय वर्दास्त नहीं करेगा पर ऐसा ही है , जम्मू-कश्मीर के अन्दर कोई भी अगर भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करता है , तो उसे अपराध मान्य नहीं होगा

जिस उच्चतम कोर्ट का आदेश सरकार भी मानती है उसका , भारत के उच्चतम न्यायालय के आदेश जम्मू-कश्मीर के अन्दर वैल्यू नहीं है अर्थात मान्य नहीं है ।

भारत की पार्लियामेंट जम्मू-कश्मीर के बारे में या उससे सम्बंधित कोई भी क़ानून एक लिमिटेड दायरे में ही करा सकती है
इसको लेकर वबाल है ,

जम्मू-कश्मीर की कोई लेडी अगर भारत के किसी इतर स्टेट के पर्सन से शादी या मैरिज निकाह कर ले तो उस महिला की नागरिकता खुदबखुद समाप्त होजायेगी ।

अनुच्छेद 35A और जम्मू कश्मीर कैसे प्रभावित् करता है देश के अन्य राज्यों के प्रवाशिओ पर

इसके विपरीत अचम्भित करने वाली बात ये है , यदि वह पकिस्तान के किसी आदमी से विवाह कर ले तो उसे भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता प्राप्त हो जायेगी ।

ये लो बड़ी बात , वहा ऑडिट और रिपोर्ट मांगने जैसी चीजे तो पेद्दा ही नहीं हुई जोचाहे वो करो , धारा 370 की वजह से कश्मीर में आरटीआई (RTI) फाइल नहीं किया जा सकता यह यहाँ लागू नहीं होता और

सीएजी (CAG) जैसे कानून मतलब जो रोक लगसक्ता है लागू नहीं होते है।

कश्मीर में महिलाओं पर शरियत कानून लागू है।

कश्मीर में पंचायत को अन्य राज्यों की तरह अधिकार प्राप्त नहीं है।

कश्मीर में चपरासी को हमेशा 2500 रूपये ही मिलते हैऔर जब तक है ३७० मिलते रहेंगे ।

कश्मीर में अल्पसंख्यकों [हिन्दू-सिख] को 16% आरक्षण नहीं मिलसकता माइनॉरिटी लॉ वहा नहीं चलता ।

धारा 370 की वजह से कश्मीर में बाहर के लोगवहा जाकर अपना घर नहीं बना सकते वहा जमीन नहीं खरीद सकते हैं।

धारा 370 की वजह से ही कश्मीर में रहने वाले जो भी पाकिस्तानी रहते है उन पाकिस्तानियों को भी भारतीय नागरिकता सरलता से मिल जाती है।ये डायरेक्ट एंट्री मारने का फार्मूला है पाकिस्तान के निवासियों का अगर वो इंडिया आकर रहना चाहते है

 

बाद में किये गए कुच्छ अपडेट अनुच्छेद_३७०

(अ) १९५४ में चुंगी, केंद्रीय अबकारी, नागरी उड्डयन और डाकतार विभागों के कानून और नियम जम्मू-कश्मीर को लागू किये गये।
(आ) १९५८ से केन्द्रीय सेवा के आई ए एस तथा आय पी एस अधिकारियों की नियुक्तियाँ इस राज्य में होने लगीं। इसी के साथ सी ए जी (CAG) के अधिकार भी इस राज्य पर लागू हुए।
(इ) १९५९ में भारतीय जनगणना का कानून जम्मू-कश्मीर पर लागू हुआ।
(र्ई) १९६० में सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध अपीलों को स्वीकार करना शुरू किया, उसे अधिकृत किया गया।
(उ) १९६४ में संविधान के अनुच्छेद ३५६ तथा ३५७ इस राज्य पर लागू किये गये। इस अनुच्छेदों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में संवैधानिक व्यवस्था के गड़बड़ा जाने पर राष्ट्रपति का शासन लागू करने के अधिकार प्राप्त हुए।
(ऊ) १९६५ से श्रमिक कल्याण, श्रमिक संगठन, सामाजिक सुरक्षा तथा सामाजिक बीमा सम्बन्धी केन्द्रीय कानून राज्य पर लागू हुए।
(ए) १९६६ में लोकसभा में प्रत्यक्ष मतदान द्वारा निर्वाचित अपना प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया।
(ऐ) १९६६ में ही जम्मू-कश्मीर की विधानसभा ने अपने संविधान में आवश्यक सुधार करते हुए- ‘प्रधानमन्त्री’ के स्थान पर ‘मुख्यमन्त्री’ तथा ‘सदर-ए-रियासत’ के स्थान पर ‘राज्यपाल’ इन पदनामों को स्वीकृत कर उन नामों का प्रयोग करने की स्वीकृति दी। ‘सदर-ए-रियासत’ का चुनाव विधानसभा द्वारा हुआ करता था, अब राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होने लगी।
(ओ) १९६८ में जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय ने चुनाव सम्बन्धी मामलों पर अपील सुनने का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को दिया।
(औ) १९७१ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद २२६ के तहत विशिष्ट प्रकार के मामलों की सुनवाई करने का अधिकार उच्च न्यायालय को दिया गया।
(अं) १९८६ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद २४९ के प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू हुए।
(अः) इस धारा में ही उसके सम्पूर्ण समाप्ति की व्यवस्था बताई गयी है। धारा ३७० का उप अनुच्छेद ३ बताता है कि ‘‘पूर्ववर्ती प्रावधानों में कुछ भी लिखा हो, राष्ट्रपति प्रकट सूचना द्वारा यह घोषित कर सकते है कि यह धारा कुछ अपवादों या संशोधनों को छोड दिया जाये तो समाप्त की जा सकती है।               — wikipedia

अनुच्छेद 35A और जम्मू कश्मीर कैसे प्रभावित् करता है देश के अन्य राज्यों के प्रवाशिओ पर

 

दलितों के सन्दर्भ में बदल जाता है ये कानून , जम्मू कश्मीर में होता रहा है दलितों के अधिकारों का हनन

 

१९ मई १९५४ के वक़्त जब ये कानून लागू किया गया उस समय इस में इस बात का कही जिक्र नहीं था की बाहर से जो दलित वाल्मीकिओ को बुलाया गया उनके लिए इसमें क्या प्रयोजन होगा , उनको कई पीडिया बीत गयी लेकिन आज भी वो अपने अधिकारों और वाजिफ मेहनताने से वंचित है इस प्रकार उस समय से ही वहा दलितों का शोषण होरहा है ,

 

Related posts